कैनबिस (भांग या गांजा) का वैधानिकीकरण: उचित या अनुचित?

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चर्चा का कारण

हाल ही में आयुष विशेषज्ञों ने भांग (Cannabis) के चिकित्सीय प्रयोग को कानूनी मंजूरी देने की वकालत की है। इसके अलावा दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका डाली गई है, जिसमें कहा गया है कि प्रतिबंधित मादक पदार्थ भांग को मेडिकल उपयोग के लिए वैध बनाया जाए।

परिचय

मारिजुआना धरती पर सबसे अधिक प्रचलित नशीला पदार्थ होता है। मारिजुआना (भांग-चरस- गांजा-हशीश) का दूसरा नाम कैनबिस भी है। यह कैनबिस सैटाइवा नाम के पौधे से प्राप्त होता है। इसे गांजा के पौधे से भिन्न-भिन्न विधियों (गांजा, चरस और भांग) से बनाया जाता है।

उल्लेखनीय है कि भांग के पौधे के फूल, पत्तियों और तनों को सूखाकर बनने वाला गांजा सबसे ज्यादा प्रचलित है। मादा पौधों से जो रालदार स्राव निकलता है, उसे हाथ से काछकर अथवा अन्य विधियों से संगृहीत किया जाता है। इसे चरस या सुल्फा कहा जाता है। कैनबिस के सभी प्रकार के पौधों की पत्तियों से भांग तैयार की जाती है। कैनबिस सैटाइवा की सूखी पत्तियाँ हशीश कहलाती हैं।

पृष्ठभूमि

कैनबिस (भांग) का उपयोग 2000-1400 ईपू. से होता आया है। शुरूआती दिनों में अर्थात् इतिहास में इसे पवित्र घास के रूप में जाना जाता था।

एक प्राचीन ग्रंथ सुश्रुत संहिता में कैनबिस के चिकित्सकीय महत्त्व के बारे में बताया गया है। भारतवर्ष में कैनबिस के पौधे सभी जगह पाये जाते हैं। भांग के पौधे 3.8 फुट ऊंचे होते हैं। इसके पत्ते एकान्तर क्रम में व्यवस्थित होते हैं।

वैश्विक स्थिति

  • हाल ही में कैनबिस को वैध बनाने वाला कनाडा उरुग्वे के बाद दुनिया का दूसरा देश बन गया है। विदित हो कि दिसंबर 2013 में सबसे पहले उरुग्वे ने कैनबिस के उत्पादन, बिक्री और खपत को वैध किया था।
  • वर्तमान कानून के तहत कनाडा के लोग अब अपने घर में चार पौधे लगा सकेंगे और व्यक्तिगत उपयोग के लिए 30 ग्राम सूखी भांग (गांजा) रख सकेंगे।
  • इसके अतिरिक्त देश के सभी प्रांतों को गांजे के बिजनेस को नियमित बनाने के लिए लाइसेंस देने की अपनी व्यवस्था कायम करने की भी अनुमति दी गई है। उल्लेखनीय है कि गांजा उगाना 1923 से पहले कनाडा में एक अपराध माना जाता था, लेकिन वर्ष 2001 से इसे औषधि उपयोग के लिए कानूनी मंजूरी प्राप्त हुई।
  • इसी तरह जॉर्जिया और दक्षिण अफ्रीका में अदालत के फैसलों ने व्यक्तिगत खेती और भांग की खपत को वैध बनाने का नेतृत्व किया है, लेकिन कानूनी बिक्री का नहीं।
  • जिन देशों ने भांग के चिकित्सीय उपयोग को वैध बनाया है उनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, चिली, कोलंबिया, जर्मनी, ग्रीस, इजराइल, इटली, नीदरलैंड, पेरू, पोलैंड, श्रीलंका और यूनाइटेड किंगडम (1 नवंबर, 2018 से प्रभावी) शामिल हैं।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में, 31 राज्यों और कोलंबिया जिले ने भांग के चिकित्सा उपयोग को वैध बनाया है, लेकिन संघीय स्तर पर, इसका उपयोग किसी भी उद्देश्य के लिए निषिद्ध है।
  • नौ अमेरिकी राज्यों, साथ ही वाशिंगटन डीसी में मारिजुआना का मनोरंजक उपयोग कानूनी है।
  • हाल ही में इस संदर्भ में थाइलैंड की नेशनल असेंबली द्वारा एक विधेयक पारित किया गया, जिसमें गांजा (मारिजुआना) और परंपरागत औषधीय पौधे क्रेटम पर शोध तथा चिकित्सीय उपयोग को कानूनी मान्यता दी गई है। इस नए कानून से गांजे के उत्पादन, आयात और निर्यात में मदद मिली है। बता दें कि किसी एशियाई देश में किसानों को आर्थिक लाभ दिलाने वाली इस तरह की यह पहली कोशिश है।
  • इजराइल की संसद नेसेट ने भी गांजा के मेडिकल उपयोग के लिए निर्यात को कानूनी मान्यता प्रदान की है। अभी इस बिल को कैबिनेट तथा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद इजराइल विश्व का ऐसा करने वाला तीसरा देश (नीदरलैंड्स और कनाडा के बाद) बन जायेगा।

भारत की स्थिति

भारत में मादक पदार्थों के संदर्भ में नारकोटिक ड्रग एवं सायकोट्रोपिक सब्सटेंस अधिनियम, 1985 (The Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985) बनाया गया था, जिसे प्रभावी बनाने के लिए 2014 में संशोधन बिल लाया गया। इसके आधार पर 2015 में नया कानून बनाया गया। यह एक्ट चरस, गांजा या फिर कैनबिस के दूसरे रूपों को पूरी तरह प्रतिबंध लगाता है। हालांकि इस कानून में कैनबिस की परिभाषा में भांग को नहीं जोड़ा गया है।

दरअसल इसकी वजह भांग का धर्म से जुड़ाव होना भी है। भारत में भांग को प्रसाद के रूप में उपभोग करने का चलन रहा है। यही कारण है कि इसकी महत्ता समाज में बनी हुई है। विश्व में भांग के बढ़ते महत्त्व को देखते हुए हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने भांग की फसल उगाने के लिए इंडियन इंडस्ट्रियल हेंप एसोसिएशन (Indian Industrial HEMP Association) को लाइसेंस जारी किया है।

संभाव्यता इसके साथ ही उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है। कुछ शर्तों के साथ जहां कानूनी रूप से भांग की खेती की अनुमति दी गई है। भांग का व्यावसायिक कृषिकरण कर किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार ने कानूनी रूप से इसकी खेती को मंजूरी दी है। ठीक इसी तरह का एक अन्य फैसला उतरप्रदेश सरकार द्वारा भी लिया गया है। इसका मसौदा तैयार कर सरकार ने अधिसूचना भी जारी कर दी है। जारी नियमावली को उत्तर प्रदेश आबकारी नियमावली 2018 का नाम दिया गया है जिसके अनुसार खेती में चरस अथवा गांजा जैसे किसी मादक पदार्थ का क्रय-विक्रय, भंडारण या उपयोग में लिप्त होने पर सजा का प्रवधान किया गया। वही भांग की फसल का मानकः 0.3 प्रतिशत या उससे कम टेट्रा हाइड्रो कैनाबिनाल रखा गया है, यदि यह प्रतिशत 0.3 से अधिक होता है तो फसल को आबकारी आयुत्तफ़ के निर्देश के अनुसार नष्ट कर दिये जाने का आदेश है।

कैनबिसः बहस का मुद्दा

कैनबिस (मारिजुआना) की वैधता को लेकर आज दुनियाभर में बहस तेज हो गयी है, एक वर्ग विशेष है जो इसकी वैधता को आज के समय की मांग बता रहा है तो वहीं दूसरी तरफ एक वर्ग है जो इसकी वैधता के परिणामों को लेकर चिंतित है। इस संदर्भ में किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले जरूरी है कि इसकी वैधता या अवैध ता को लेकर जो तर्क दिए जा रहे हैं उसका विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए।

पक्ष में तर्क

  • भारत में ब्रिटिश शासन के समय कैनबिस को लेकर लाइसेंस और कर की व्यवस्था थी लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात जब संविधान में मादक पदार्थों को लेकर विचार-विमर्श हो रहा था, तब अनुच्छेद-47, 48 को जोड़ा गया, जो मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक औषधियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है।
  • उस समय तम्बाकू को लेकर भी बहस हुई लेकिन एक बार भी कैनबिस सैटाइवा पौधे का जिक्र नहीं हुआ। इस प्रकार कहा जा सकता है कि हमारे संविधान निर्माता भी कही न कहीं कैनबिस को गलत नहीं मानते थे, इसलिए उन्होंने संविधान में कहीं कैनबिस के बारे में नहीं लिखा।
  • यह हमारे किसानों के लिए आय का एक अच्छा स्रोत साबित हो सकता है। उल्लेखनीय है कि एक हेक्टेयर भूमि पर भांग की खेती करने से किसान को तीन महीने के भीतर करीब तीन लाख का मुनाफा हो सकता है। भांग की खेती तीन महीने के भीतर तैयार होती है, जिन स्थानों पर सिंचाई की सुविधा होती है, वहां दो बार इसकी खेती की जा सकती है।
  • कैनबिस (भांग) का महत्व न सिर्फ चिकित्सीय क्षेत्र में है, बल्कि बहुत सारे ऐसे उद्योग हैं, जहाँ कच्चे माल के रूप में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • विदित हो कि काफी सारे देश जैसे-अमेरिका व अन्य देश हैं, जहाँ कैनबिस पर प्रतिबंध था, लेकिन अब उसे वैधता दे दी गई है।
  • अगर गरीब लोगों को इस प्रकार से आसान और सस्ते में भांग मिलना शुरू हो जाए तो एल्कोहल, सिगरेट का सेवन कम किया जा सकता है। हमारे देश के अंदर में बहुत सारे ऐसे जनजातीय क्षेत्र हैं जहाँ आय के रूप में (मारिजुआना) कैनबिस का प्रयोग होता है।
  • चिकित्सीय दृष्टि से देखा जाए तो इसका महत्त्व काफी बढ़ जाता है। दरअसल कैनबिस में उत्तेजक (Inflammatory) गुण की मात्रा बहुत अधिक होती है जो कि हमारे शरीर के दर्द, बुखार जैसी समस्या को दूर करने में बहुत लाभकारी औषधि हो सकती है। इसके साथ ही इसके उत्तेजक गुण कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से भी राहत दिलाने में काफी फायदेमंद होते हैं।
  • उल्लेखनीय है कि इंसानों और जानवरों पर किए गए प्रयोगों के आधार पर अध्ययन में यह पाया गया है कि इनका इस्तेमाल मिर्गी, पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर, अल्जाइमर, पार्किंसंस, सिकल सैल और स्क्लीरोसिस जैसी और उससे संबंधित रोगों के उपचार में भी किया जा सकता है।
  • कई महीनों की रिसर्च के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से भी यह दावा किया गया है कि कैनाबडियल (सीबीडी) का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें एडिक्शन पैदा करने वाले कोई कारक नहीं होते हैं।

विपक्ष में तर्क

  • कैनबिस के सेवन से बहुत ज्यादा अपराधिक घटनाएँ होती हैं। ऐसे में समाज में जो नशे के लिए कारण दिए जाते हैं, वो सब चीजें इस पर भी लागू होती हैं।,
  • कैनबिस को वैधता देने से जो काम चोरी-छिपे होता है वह खुलेआम होने लगेगा जिसका गंभीर परिणाम समाज को हो सकता है।
  • गौरतलब है कि ठीक इसी तरह जब सिगरेट के अंदर निकोटिन को लेकर बहस चल रही थी कि इसको वैधता दिया जाए या नहीं तब भी कई लोगों ने इस पर आपत्ति दर्ज की थी इसके बावजूद इसे वैध किया गया। जिसके बुरे प्रभाव देखने को मिले रहे हैं।
  • आज सिगरेट पीने से इतनी गंभीर बीमारियाँ हो रही हैं कि सरकार को एक कैंपेन चलाना पड़ रहा है ताकि तम्बाकू का सेवन कम हो सके। उदाहरण के लिए सिगरेट के 85% भाग पर घातक नतीजों की तस्वीर देना आदि। ऐसे में कैनबिस को वैधता देने से सरकार को फिर से इस तरह के गंभीर परिणाम व कैंपन चलाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
  • विदित हो कि आयुर्वेद में कैनबिस को उपविष वर्ग में रखा गया है जो इसकी घातकता को बताती है।
  • अगर कोई व्यक्ति कैनबिस का प्रयोग करता है तो उसके दिमांग का विकास भी सही से नहीं हो पाता हैं।
  • अगर कैनबिस को वैधता दिया गया तो इसका बहुत ज्यादा व्यावसायीकरण हो जाएगा। एक समय था जब तम्बाकू के बारे में भी यही बोला जाता था कि तम्बाकू प्राकृतिक पौधा है जो नुकसानदायक नहीं है। लेकिन नतीजे इसके उलट हैं।
  • लेकिन आज तम्बाकू का पूरा व्यावसायीकरण हो चुका है। तम्बाकू उद्योग ने आगामी समय में सिगरेट को बढ़ावा दिया ताकि आसानी से उसमें तम्बाकू का प्रयोग किया जा सके। उल्लेखनीय है कि उस समय बड़े स्तर पर सिगरेट का व्यावसायीकरण, विज्ञापन किया गया तथा युवाओं को आकर्षित किया गया। नीतजतन गंभीर बीमारियों से लोग प्रभावित हुए। ऐसे में UNO द्वारा संधि लायी गई इससे सबक न लेकर कैनबिस को वैधता देना उचित नहीं कहा जा सकता है।
  • आज सरकार तम्बाकू और सिगरेट से अच्छा आय प्राप्त कर रही है लेकिन इसके सेवन से जो लोग बीमार होते हैं या फिर अपनी जान गवाँ देते हैं क्या उनकी क्षतिपूर्ति की जा सकती है।
  • यदि एक बार कैनबिस (भांग) को वैधता दे दी गई तो जैसे तम्बाकू उद्योग बहुत ज्यादा लांबिग (गुटबाजी) करती है तथा सरकार को कानून नहीं बनाने देती है व अदालत में मामला जाने पर उसे लटकाती है वैसा ही कुछ कैनबिस के व्यवसायीकरण से अगामी समय में हो सकता है। ज्ञातव्य है कि व्यावसायीकरण का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा उत्पाद को बेचना होता है।
  • कैनबिस को वैधता देने की जो माँग चल रही है उसके पीछे एक वजह यह भी है कि तम्बाकू उत्पाद की बिक्री कम होने लगी है। ऐसे में वह कंपनी जो तम्बाकू उत्पाद को बेचा करती थी उदाहरण के तौर पर मालबोरो सिगरेट की कंपनी अल्टीरिया (Altria) व अन्य कंपनी। वह अब निवेश के लिए कैनबिस के बाजार में अवसर तलास रही है। उल्लेखनीय है कि अल्टीरिया ने 12 हजार 4 सौ करोड़ रुपए का निवेश कैनबिस बाजार में किया है।
  • ऐसी ही बड़ी-बड़ी अन्य कंपनी अगर कैनबिस के बाजार में निवेश करना शुरू करती है तो बहुत अधिक व्यावसायीकरण आगामी समय में होगा जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ेगा। उदाहरण के लिए अमेरिका में बड़े स्तर पर विज्ञापन द्वारा युवाओं को लक्ष्य बनाया जा रहा है ताकि वे पूरी जिंदगी उनके उत्पाद का सेवन कर सकें। आइस्क्रीम, स्वीट, सॉफ्रट ड्रिंक्स के रूप में भी कैनबिस के उत्पाद बेचे जा रहे हैं।
  • विदित हो कि 1961 में इसी संयुक्त राष्ट्र ने एक संधि लायी थी जिसका पश्चिमी देशों ने बड़े स्तर पर समर्थन भी किया था। संधि में ड्रग्स, कैनबिस के उत्पाद पर रोक लगाने पर बल दिया गया था।
  • हालांकि भारत द्वारा इस संधि का विरोध किया गया था चूँकि भारत के अनुसार इसमें कई कमियाँ थी। लेकिन विडम्बना यह है कि आज पश्चिम के देश इसकी माँग कर रहे हैं, कि कैनबिस के साथ दूसरे ड्रग्स को भी वैधता दे दी जाए जिसे उचित नहीं कहा जा सकता है।

कैनबिस के प्रभाव

  • कैनबिस के लगातार इस्तेमाल से तार्किक समझ और फैसले लेने में मुश्किल हो सकती है। साथ ही गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • इस बात का प्रमाण बढ़ रहा है कि जो लोग किसी गंभीर मानसिक बीमारी, अवसाद या मनोविकृति से ग्रसित होते हैं उनमें कैनबिस उपयोग की संभावना अधिक होती है या फिर अतीत में इन लोगों ने कैनबिस लंबी अवधि के लिए इस्तेमाल किया है। कैनबिस के नियमित उपयोग से साइकोटिक एपिसोड या स्किजोफ्रेनिया होने का खतरा दोगुना हो सकता है।
  • कैनबिस के सेवन से लोग अनेक शारीरिक व्याधियों के शिकार हो सकते हैं। वहीं हिंसा और गुनाह की प्रवृत्ति के चपेट में आने से स्वयं को तथा परिवार को संकट में डाल सकते हैं।

आगे की राह

आज बहुत सारे देशों में जहां इसे प्रतिबंधित किया गया था वह भी कैनबिस के फायदे को लेकर रिसर्च कर रहे हैं। ऐसे में आवश्यकता भारतीय स्तर पर भी इसी तरह के रिसर्च की है। भले ही सरकार इसे देश में वैधता ना दे लेकिन इस दिशा में जरूरी कदम उठाये और देखें कि क्या कैनबिस के प्रभाव सही मायने में अच्छे हैं या बुरे हैं। अगर इसका अच्छा प्रभाव सामने आता है, तो सरकार को इसे वैधता देना चाहिए। इसके लिए सरकार को कुछ सावधानियों पर भी ध्यान देनी चाहिए जैसे-

  • सरकार को यह प्रयास करना चाहिए कि कैनबिस (भांग) का व्यावसायीकरण उस स्तर का ना हो सके जैसे अमेरिका में देखा जा रहा है। आज वहाँ कैनबिस को आइस्क्रीम सॉफ्रट ड्रिक्स आदि रूपों में परोसा जा रहा है।
  • भारत सरकार को चाहिए कि वह बच्चों, युवा या फिर वे लोग जो किसी प्रकार कैनबिस का प्रयोग कर रहे हैं उन्हें इसके गलत प्रभावों की जानकारी दे।
  • सरकार को चाहिए कि वे उन लोगों को जो कैनबिस के आदि हो चुके हैं, उन्हें अच्छी स्वास्थ्य व सुविधा उपलब्ध करायें।

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